चोरी-चोरी (1956) ओ टिम का टिमा टिम्भा तारे करें अचम्भा

Review of Chori-chori (1956) in Hindi

written by

Shashank Dubey

कुछ अरसा पहले भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ के लिए मैं पुरानी सदाबहार फिल्मों पर ‘मैटिनी शो’ शीर्षक से एक कॉलम लिखता था. लगभग 7 वर्ष तक यह कॉलम चला और इसमें लगभग पचास फिल्मों पर आलेख लिखे गए. इसी सिलसिले में ‘चोरी चोरी’ पर लिखा गया लेख सभी शंकर-जयकिशन प्रेमियों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत है: चोरी-चोरी  तारेतारे अवलोकनार्थ प्रस्तुत है:

चोरी-चोरी (1956)
ओ टिम का टिमा टिम्भा तारे करें अचम्भा

शशांक दुबे

उज्जैन के मेरे अभिन्न फ़िल्मप्रेमी मित्र ओमप्रकाश पोरवाल का कहना है कि हिंदी फ़िल्मों के इतिहास में दो ब्लॅक एंड व्हाइट फ़िल्में ऐसी हैं, जिनके शुरु होते ही दस मिनट में पैसे वसूल हो जाते हैं, बाकि फ़िल्म तो हम बोनस में देखते हैं. इनमें से एक तो है मधुमति, जिसका सुहाना सफर और ये मौसम हँसी गीत अपने जंगलों में खिली धूप का माहौल जस-का-तस रखने के कारण दिल जीत लेता है और दूसरी चोरी-चोरी, जिसमें इससे पेश्तर कि दर्शक अपनी सीट पर व्यवस्थित हों, उस पार साजन इस पार धारे, ले चल ओ माझी किनारे गीत शुरु हो जाता है. एक ऐसा सुमधुर गीत जिसमें कोरस का ओ टिमका टिमा टिम्भा तारे करें अचम्भा कहना भावी फ़िल्म के अलौकिक माहौल की झलक ख़ुद बयाँ कर देता है. बरसों तक पारिवारिक-मनोरंजक फ़िल्मों की गारंटी के रूप में पहचाने जाने वाले एवीएम की चोरी-चोरी कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण फ़िल्म है. यह लोकप्रियता और उत्कृष्टता की दोहरी कसौटियों पर निर्विवाद रूप से नंबर वन का खिताब रखने वाले संगीतकार शंकर-जयकिशन के कैरियर का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है, यह राज कपूर द्वारा अभिनीत गैर-आर. के. कैंप की पहली उल्लेखनीय फ़िल्म है, यह फ़िल्मी दुनिया की सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ जोड़ी राज कपूर और नरगिस के साझे-सफर का अंतिम मुकाम है. यह फ़िल्म अपनेसमय की कुछ जटिल भ्रांतियों को भी तोड़ती है. एक तो यह कि शंकर-जयकिशन ने अपने कामकाज का सर्वोत्कृष्ट आर.के. को दिया है, दूसरा राज कपूर के लिए मुकेश से बढ़कर कोई पार्श्व गायक नहीं है और तीसरा अपने यहाँ हॉलीवूड की सफल फ़िल्मों से प्रेरणा लेकर बनाई जाने वाली फ़िल्में मूल की तुलना में कमज़ोर ही बनती हैं. चोरी-चोरी इन तीनों भ्रमों को डंके की चोट पर तोड़ती है.

इसमें कोई शक नहीं कि राज कपूर को संगीत की अच्छी समझ थी, वे अकार्डियन, हॉरमोनियम, डफ समेत कई वाद्ययंत्र बजाना जानते थे और अपनी फ़िल्म के संगीत पर जम कर मेहनत करते थे. लेकिन कला और सृजन के क्षेत्र में यह देखा गया है कि कई बार अपने मूल क्षेत्र से इतर अन्य विषयों का ज्ञान अनावश्यक हस्तक्षेप को आमंत्रित करता है और इस प्रकार के हस्तक्षेप के दबाव का परिणाम यह होता है कि सृजक अपनी कूबत का सोलह आने आउटपुट नहीं दे पाता है. कहना ना होगा कि यदि आवारा और श्री 420 शंकर-जयकिशन के सृजन का चौदह आना, जिस देश में गंगा बहती है बारह आना, संगम दस आना, मेरा नाम जोकर आठ आना और कल आज और कल दो आना है तो चोरी-चोरी (और अनाड़ी व तीसरी कसम भी) सोलह आना है, जिसके संगीत के किसी भी अंश पर कोई भौंहे नहीं तरेर सकता. संजीदा पार्श्व गायन में मुकेश का कोई सानी नहीं और राज कपूर के लिए तो उनकी आवाज़ के क्या कहने, लेकिन चोरी-चोरी में शंकर-जयकिशन ने उनके बदले मीठे गले वाले पार्श्व गायन में मुकेश का चयन करके चाशनी सी मधुर धुनों में इलायची के सुगंधित दाने डाल दिए हैं. यही कारण है कि उनसठ साल बाद आज भी चोरी-चोरी के गाने सदाबहार और सुगम संगीत के प्रशिक्षुओं के लिए पाठशाला हैं. जिस प्रकार साठ के दशक में माउथ आर्गन सीखने वाला हर युवा है अपना दिल तो आवारा न जाने किस पे आएगा बजाते हुए लहराना चाहता था, सत्तर के दशक में वायलिन सीखने वाले हर किशोर की अंतिम मंज़िल शोर का इक प्यार का नगमा है मौजों की रवानी है हुआ करती थी, अस्सी के दशक में ड्रम का हरेक दीवाना कुर्बानी के लैला मैं लैला की बीटॅ पर हाथ साफ करना चाहता था, नब्बे के दशक के बच्चे बैंजो पर दीदी तेरा देवर दीवाना का शुरुआती टुकड़ा बजाना चाहते थे और मौजूदा दशक में सीटी बजाने वाला हर युवा फना के चाँद सिफारिश जो करता हमारी में बार-बार बजने वाली सीटी को कम-से-कम एक बार सही ढंग से बजाने की हसरत रखता है, उसी प्रकार पचास के दशक में हारमोनियम पर सुगम संगीत का रियाज़ आजा सनम मधुर चाँदनी में हम के बगैर पूरा नहीं हो पाता था. हाँ, वो बात दीगर है कि मूलतः इस गीत में हारमोनियम का नहीं, बल्कि सीनियरटी के हिसाब से उसके जूनियर लेकिन रसूख़ के नज़रिये से सीनियर उसी परिवार के सदस्य अकार्डियन का प्रयोग हुआ है. चोरी-चोरी का संगीत यहीं जाकर पूरा नहीं होता. इसमें जहाँ मैं जाती हूँ वहीं चले आते हो गीत भी है, जिसके हर अंतरे की पहली लाइन मसलन ओ मैं तो शोर मचाऊँगी, शोर मचाऊँगी के बाद कठपुतली का रंगतभरा संगीत है, जो गाने का रोमांच कई गुना बढ़ा देता है. इसमें रसिक बलमा की उदासी है, तो पंछी बनूँ उड़ती फिरूँ मस्त गगन में में आज़ादी का अपरिमित उत्साह और तिस पर गेस्ट अपीरियंस में मन्नाडे का हिल्लोरी कहने का तो कहना ही क्या? फ़िल्म में लता-आशा का एक युगल गीत भी है- मन भावन के घर जाए गोरी/ घूँघट में शरमाए गोरी/ बँधी रहे ये प्यार की डोरी / हमें ना भुलाना जिसमें नायिका की सहेलियाँ कहती है: बचपन के दिन खेल गँवाए/ आई जवानी तो बालम आए/ तेरे आंगन बंधे बधाई गोरी/ क्यूँ नैना छलकाए गोरी/ बँधी रहे ये प्यार की डोरी हमें ना भुलाना.

यह फ़िल्म हालीवूड की सफल कॉमेडी फ़िल्म इट हेप्पन्ड वन नाइट से प्रेरित थी. बाद में नब्बे के दशक में इसी की अनुकृति महेश भट्ट ने दिल है कि मानता नहीं (आमिर खान और जूही चावला) के नाम से बनाई, जिसे नदीम-श्रवण के सीमित रेंज के लेकिन मधुर संगीत और आमिर-जूही के अच्छे अभिनय के कारण लोगों ने काफी पसंद किया था. इस प्रकार चोरी-चोरी, इट हेप्पन्ड वन नाइट की फोटोकॉपी है, ओरिजिनल से अच्छी फोटोकॉपी. फिर दिल है कि मानता नहीं को क्या कहेंगे, फोटो कॉपी की फोटो कॉपी, थोड़ी सी धुँधली. फ़िल्म का नायक राज कपूर एक टैब्युलाइड का रिपोर्टर है, जो सनसनीखेज कहानियाँ लिखकर अखबार के मालिक से तगड़ा पारिश्रमिक पाता है. वह ऐसे ही किसी शिकार की तलाश में हैं कि उसका सामना एक तेज़-तर्रार, पढ़ी-लिखी और संपन्न लड़की नरगिस से होता है, जो अपने पिता (गोप) के घर से भागकर अपने प्रेमी (प्राण) से शादी करने के लिए निकल पड़ी है. दोनों का सफ़र बस में साथ-साथ शुरु होता है, जहाँ राज नरगिस की अपने पैर पर आई अटैची को नरगिस की ओर लुढ़का देते हैं, बदले में नरगिस भी वही अटैची राज की ओर ही लुढ़का देती है, गुस्से में राज वह अटैची फिर नरगिस की ओर लुढ़काते हैं और किसी क्रिया के बराबर प्रतिक्रिया वाले वैज्ञानिक फॉर्मुले के तहत नरगिस फिर वह अटैची उनकी ओर लुढ़का देती है, यह लुढ़का-लुढ़की, खींच-तान, तकरार-इकरार कदम-कदम पर चलती है. बस के खराब होने पर नरगिस तो पंछी बनूँ उड़ती फिरूँ मस्त गगन में गाने निकल पड़ती हैं और उधर बस ठीक होकर दोबार पौं-पौं बजाकर निकल जाती है. भूख से बिलबिलाती नरगिस को जब राज भुट्टा ऑफर करता है, तो वह नरगिसी शैली में ही नाक सुड़क कर मना कर देती है और राज टूटी पुलिया पर बैठे-बैठे गुनगुनाते हैं ना मानी पछताएंगी बहुत मजे की खाएंगी. इस बीच गोप अपनी बेटी की गुमशुदगी का इश्तेहार अखबार में छपवा देता है और उस पर सवा लाख का तगड़ा इनाम रख देता है. नतीजतन टब्बू आँखों वाला धोबी (भगवान दादा) मय गोलमटोल धोबिन के उसके पीछे पड़ जाता है. इनाम के फेर में दोनों पति-पत्नी दुआ माँगते हुए गाते हैं- तुम अरबों का हेर-फेर करने वाले रामजी सवा लाख की लॉटरी भेजो अपने भी नाम जी. दूसरी ओर जॉनी वॉकर मय अपने बारह बच्चों के ऑल लाइन क्लीयर गाते-गाते इनाम की कोशिशें तेज़ कर कर देता है. इधर राज-नरगिस को तूफानी बारिश में शरण लेने के लिए एक गेस्ट हाउस में पति-पत्नी बनकर भी रहना पड़ता है. नायिका जल्द से जल्द अपनी मंज़िल तक पहुँचना चाहती है इसलिए उसे इंतज़ार है रात खत्म होने का, बारिश के थमने का. राज कपूर अपनी कहानी में पैंच तलाशने की गरज से रात को लंबा खींचना चाहता है. और दर्शक? दर्शक चाहते हैं कि यह दृश्य यहीं थम जाए, क्योंकि इसी बारिश में ये रात भीगी भीगी, ये मस्त फिज़ाएँ, उट्ठा धीरे-धीरे वो चाँद प्यारा-प्यारा गीत है. एक ऐसा दिलकश गीत जिसके बारे में दाद देने वाला दुविधा में पड़ जाता है कि यह जो लता-मन्ना डे के गले से रस बरस रहा है, ये जो राजकपूर के मात्र हाथ की भंगिमाओं से बेचैनी प्रकट हो रही है, ये नरगिस जो अब आइंदा राज कपूर के साथ नहीं दिख पाएंगी, आँखों से अपनी व्यग्रता दिखा रही है, इन सब में कौन सर्वश्रेष्ठ है?. बहरहाल. इन सभी से छुपते-छुपाते राज नरगिस को उसकी मंजिल तक पहुँचा देता है, मगर वहाँ नरगिस को प्राण की असलियत मालूम पड़ती है कि वह फाँदेबाज़ किस्म का इंसान है और वह एक बार फिर राज के साथ लौट पड़ती है. सैल्यूलाइड पर लिखी एक कविता- यह अनुशासन ही देश को महान बनाता है और देशाटन से चरित्र निर्माण होता है की तरह ही घिसा-पिटा जुमला है, जो कई फ़िल्मों के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है, लेकिन चोरी-चोरी का इत्ते से काम नहीं चलेगा. क्योंकि यह महज कविता नहीं अमृत रस है, थियेटर में बिखरा अमृत रस.
साभार : श्री शशांक दुबे
09833920630

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